Bharat Ghumkkad Samaj Darshan Foundation

झाबुआ- अंचल

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शहर से गाँव तक…

जहाँ प्रकृति, संस्कृति और इतिहास मिलते हैं!

Experience eco-cultural & responsible tourism amidst the living heritage of Jhabua's tribal belt. Discover offbeat destinations, lush forests, ancient temples, waterfalls, and the vibrant tribal way of life. This is more than a tour — this is a celebration of our roots!

BHARAT GHUMKKAD SAMAJ DARSHAN FOUNDATION

1325
गाँव
Villages
17.5L+
कुल जन संख्या
Total Population
47+33
हाट केंद्र
Haat Centres
7000+
वर्ष पुरानी
Year-old History

झाबुआ अंचल — पश्चिम भारत का जनजातीय हृदय

झाबुआ और आलीराजपुर — दो जिले, दो प्रशासनिक इकाइयाँ, लेकिन एक अंचल, एक संस्कृति, एक पहचान। यह अंचल पश्चिम भारत के ढाई करोड़ जनजातीय समाज का भौगोलिक एवं सांस्कृतिक केंद्र है। यहाँ भील, राठवा, भिलाला और पटेलिया समुदाय सदियों से प्रकृति के साथ सामंजस्य में जीते आए हैं।

हम क्यों हैं यहाँ?

🌾 Jhabua जैसे migration-hit क्षेत्र में ग्रामीण युवाओं के लिए आत्मनिर्भरता और entrepreneurship के मौके पैदा करना

🌿 Sustainable tourism के मॉडल के ज़रिए हिमायत देना — जहाँ पर्यावरण, संस्कृति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था एक साथ संवरे

🏕️ Responsible tourism — Local guides, tribal food, folk art, authentic village stays

🤝 फायदे सिर्फ हमारे नहीं — गाँव और प्रकृति को भी लाभ। हर यात्रा से समुदाय को सीधा लाभ।

Discover Tribal Jhabua

झाबुआ-अंचल को भारत के उत्कृष्ट Tribal Tourism Hub के रूप में विकसित करना

ट्राइबल आर्ट, क्राफ्ट, Healthy Snacks, Music & Festivals को देश-दुनिया से जोड़ना

Responsible Tourism — Local Guides, Tribal Food, Authentic Village Stays

फायदे सिर्फ हमारे नहीं — गाँव और प्रकृति को भी लाभ

जनजातीय संस्कृति और परंपराएँ

7000+ साल पुरानी भील जनजाति — रामायण से लेकर आज़ादी की लड़ाई तक एक गौरवशाली इतिहास। यह पहल सिर्फ यात्रा नहीं — Cultural gap को हटाने, mutual respect और learning का मौका।

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भगोरिया हाट

भारतीय प्राचीन जनजातीय संस्कृति और लोक परंपराओं का जीवंत उत्सव। होली से पूर्व झाबुआ-अंचल में मनाया जाने वाला यह पर्व समुदाय, एकता, प्रकृति और स्वावलंबन का प्रतीक है। 11वीं शताब्दी में भील राजा बलून के कार्यकाल से चली आ रही यह परंपरा आज भी जीवंत है।

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हमारी परंपरा — मातावन

हजारों साल से जंगल की रक्षा करने के लिये हमारी परम्परा है मातावन। मातावन यानी माता का घर। झाबुआ के प्रत्येक गाँव में मातावन (जंगल) है जिसमें से कोई भी व्यक्ति लकड़ी नहीं काटता। वर्ष में 3-4 बार पूजन होता है।

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हलमा — भीली परम्परा

गाँव में जब कोई परिवार संकट से नहीं उबर पाता, तब सभी ग्रामवासी निःस्वार्थ भाव से मिलकर उसे उबार लेते हैं। परमार्थ के भाव से दूसरों को संकट से उबारने की इस परम्परा का नाम 'हलमा' है।

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होली — भील समाज में

होली का असली रंग जनजातीय गाँवों में बसता है। यह पर्व केवल रंगों का नहीं, बल्कि परंपरा, आस्था और सामूहिक एकता का उत्सव है। यहाँ होली सिर्फ मनाई नहीं जाती, बल्कि पीढ़ियों से निभाई जाती है।

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गल बाबा — लोकपर्व

झाबुआ अंचल में आस्था का अद्भुत लोकपर्व गल बाबजी धुलेटी पर मनाया जाता है। भील समाज में इसे भक्त प्रह्लाद की श्रद्धा से जोड़ा जाता है। गाँव-गाँव की भागीदारी, नृत्य, भक्ति और परंपरा — यही है गल बाबजी की पहचान।

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गौहरी परम्परा

दीवाली के दूसरे दिन मनाया जाने वाला पवित्र पशु-संवर्धन पर्व। सदियों से झाबुआ, अलीराजपुर और धार में चला आ रहा यह पर्व गौमाता, प्रकृति और समुदाय के बीच सहजीवन का जीवंत प्रतीक है।

नवाई और महुआ — जीवन-दर्शन

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नवाई : संयम, सह-अस्तित्व और कृतज्ञता

नवाई जनजातीय समाज की एक अत्यंत प्राचीन, संयमपूर्ण और प्रकृति-आधारित सांस्कृतिक परंपरा है। यह परंपरा तब निभाई जाती है, जब नई फसल खाने योग्य होकर तैयार हो जाती है। तब तक अन्न-ग्रहण नहीं किया जाता, जब तक समाज सामूहिक रूप से प्रकृति, धरती और देवशक्तियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त न कर दे।

नवाई केवल एक सामुदायिक नैतिक संहिता है — इसमें व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरा समाज सहभागी होता है।

आइए, नवाई परंपरा के माध्यम से भारतीय संस्कृति के इस गहन और अनुशासित जीवन-दर्शन को निकट से जानें और अनुभव करें।
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महुआ — प्रकृति, संस्कृति और स्वावलंबन

महुआ जनजातीय समाज के लिए केवल खाद्य नहीं, बल्कि प्रकृति, संस्कृति और स्वावलंबन का प्रतीक है। महुआ के फूलों से बने लड्डू, रोटियाँ और पारंपरिक पेय पोषक, प्राकृतिक और रसायन-मुक्त होते हैं।

यह वन और मानव के सहजीवी संबंध, अनुशासन और सामूहिक जीवन-दृष्टि को दर्शाता है।

महुआ को समझना यानी जनजातीय जीवन-दर्शन को समझना।

स्वाद — खेत से थाली तक

No chemicals, No junk — Pure nature's taste, soulful hospitality

🌽 खेत से सीधे थाली तक: Locally grown millets, pulses, herbs, wild veggies
🫓 विशिष्ट व्यंजन: दाल-पानिया, मक्का रोटी, महुआ लड्डू, कच्चरी सब्जी, चना की भाजी
🍯 Forest superfoods: तेंदू, कंद, महुआ, बाजरा, जंगली शहद — Health meets tradition
👩‍🍳 Tribal Cooking Workshops: गाँव के किचन में, village aunties के साथ — learn, cook, taste!
"हर निवाला – एक कथा, एक परंपरा, एक अनुभव"

Supported By

झाबुआ संवाद — जनजातीय संवाद कार्यक्रम

🏛️

ए. पी. जे. अब्दुल कलाम इंजीनियरिंग कॉलेज, झाबुआ

Academic partner and venue support for the Jhabua Sanvad programme

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महुवा बन, इंदौर

Cultural and community partner — bridging tribal heritage with the city